उत्तराखंड में पलायन के लिए आज से लगभग बीस -पच्चीस साल पहले की वे औरतें भी ज़िम्मेदार हैं, जो ज़रा -ज़रा सी बात पर अड़ोसियों -पड़ोसियों को डायरेक्ट “तेरि कुड़ि बाँजि होली ” वाली गालियाँ देती थी |
वाइफ के गाल पर गुलाब का फूल मारने पर इंग्लिश वाइफ :- u are so noughty….. । पंजाबी वाइफ :- “तुसी वड़े रोमेंटिक लगदे हो ….. । गढ़वाली वाइफ :- । मुर्दा मोरुलु तेरु…आंखू फोड़ेली छौ मेरु ..
सासु- ब्वारी रुणि किले छै? ब्वारी- जी क्या मि भैंस जन छौ? सास- न ब्वारी न । ब्वारी- क्या मि कचोर्या छौं? सास- न भै न। ब्वारी- क्या म्यर गिचु उरख्याला जन च? सास- कु बोलणु तेकु इन। ब्वारी-क्या म्यारु नाक पकोड़ा जन च? सास-न बेटी न। ब्वारी-फिर गों वला मी खु किले बुलणा छिन की तू अपड़ी सासु जनि छै। सासु बेहोश…???
गुरूजी :- नौना…स्कूळ आणम अबेर किळे हवे ? पन्नू :- गुरूजी…बुई-बुबा ळड़ै कना छ्याई गुरूजी :- ऊं झगड़णा छ्याई त ठिक च…पर तिळ अबेर किळे क्याई ? पन्नू :- गुरूजी…इक्क जुत्ता बुबा हत्तम छै अर दुसर बुई म||